रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तारी के 8 दिन बाद जमानत मिल गई। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाते हुए उन्हें जमानत दे दी। अर्नब के साथ बीजेपी और केंद्र सरकार भी खुलकर उतर आई थी। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करना अदालत का काम है। हालांकि बहुत सारे ऐसे भारतीय हैं जो कि अब तक दोषी करार नहीं दिए गए हैं लेकिन जेल में दिन गुजारने पड़ रहे हैं।

41 वर्षीय सिद्दीक कप्पन दिल्ली के पत्रकार हैं जिनपर उत्तर प्रदेश पुलिस ने अनलॉफुल ऐक्टिविटीज प्रिवेंशन ऐक्ट (UAPA) के तहत मामला दर्ज किया था। वह लगभग 40 दिनों से हिरासत में हैं। जर्नलिस्ट यूनियन ने उनकी जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में हैबीज कॉरपस की याचिका दी है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि उन्हें सही कोर्ट में जाना चाहिए।

कश्मीर के पत्रकार आसिफ सुल्तान (31 साल) पर आतंकियों का सहयोग करने का आरोप है। वह पिछले 808 दिनों से हिरासत में हैं। उनके परिवार और सहयोगियों ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि आतंकियों के बारे में वह रिपोर्टिंग किया करते थे।

पत्रकार के अलावा भी कई लोग ऐसे हैं जो दोषी साबित नहीं हुए लेकिन की महीनों से जेल में बंद हैं। वकील सुधा भारद्वाज (58 साल) को भी यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था। लगभग ढाई साल से वह कैद हैं। 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था, ‘आप रेग्युलर बेल के लिए क्यों नहीं अप्लाइ करतीं?’

कवि वरवरा राव को भी यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था। वह 79 साल के हैं और बीमार हैं। दो साल से ज्यादा से जमानत का इंतजार कर रहे हैं। उनके परिवार का कहना है कि वह अब वॉशरूम तक जाने में भी सक्षम नहीं हैं। 83 साल के ट्राइबल राइट्स ऐक्टिविस्ट भी यूएपीए के तहत जेल में हैं। उन्हें परकिन्सन की बीमारी भी है। वह उसी जेल मे हैं जहां से अर्नब को रिहा किया गया है।

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