पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने बुधवार को कहा कि वह स्वतंत्रता के अधिकार पर उच्चतम न्यायालय की “नाराज़गी” से सहमत हैं, लेकिन जब बात कश्मीरियों की होती है तो यह चयनात्मक हो जाती है। मुफ्ती का बयान रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणी के संदर्भ में आया है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने ट्विटर पर कहा, “स्वतंत्रता के अधिकार पर उच्चतम न्यायालय की नाराज़गी से सहमत हूं, लेकिन दुख की बात है कि यह नाराज़गी चयनात्मक है क्योंकि बेबुनियाद इल्जामों पर सैकड़ों कश्मीरियों और पत्रकारों को जेलों में बंद कर रखा गया है। इन मामलों में अदालत का फैसला भूल जाइए, उनकी तो सुनवाई तक नहीं होती है। उनकी स्वतंत्रता के लिए तत्कालिकता क्यों नहीं है?”

उच्चतम न्यायालय ने 2018 के आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में पत्रकार अर्नब गोस्वामी को बुधवार को अंतरिम जमानत देते हुए कहा कि अगर व्यक्तिगत स्वतंत्रता बाधित की जाती है तो यह न्याय का उपहास होगा। शीर्ष अदालत ने विचारधारा और मत भिन्नता के आधार पर लोगों को निशाना बनाने के राज्य सरकारों के रवैये पर गहरी चिंता व्यक्त की। न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी की अवकाशकालीन पीठ ने कहा कि अगर राज्य सरकारें लोगों को निशाना बनाती हैं तो उन्हें इस बात का अहसास होना चाहिए कि नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय है।

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पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, ”हम देख रहे हैं कि एक के बाद एक ऐसा मामला है, जिसमें उच्च न्यायालय जमानत नहीं दे रहे हैं और वे लोगों की स्वतंत्रता, निजी स्वतंत्रता की रक्षा करने में विफल हो रहे हैं।” न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार से जानना चाहा कि क्या गोस्वामी को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की कोई जरूरत थी और कहा कि यह ”व्यक्तिगत आजादी” से जुड़ा मामला है। पीठ ने टिप्पणी की कि भारतीय लोकतंत्र असाधारण तरीके से लचीला है और महाराष्ट्र सरकार को इन सबको (टीवी पर अर्नब के ताने) नजरअंदाज करना चाहिए। पीठ ने कहा, ”सवाल यह है कि क्या आप इन आरोपों के कारण व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत आजादी से वंचित कर देंगे?” न्यायालय ने कहा, ”अगर सरकार इस आधार पर लोगों को निशाना बनाएगी…आप टेलीविजन चैनल को नापसंद कर सकते हैं….
लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए।”

राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से पीठ ने सवाल किया, ”क्या धन का भुगतान नहीं करना, आत्महत्या के लिये उकसाना है? यह न्याय का उपहास होगा अगर प्राथमिकी लंबित होने के दौरान जमानत नहीं दी जाती है।” न्यायालय ने कहा, ”’ए ‘बी को पैसे का भुगतान नहीं करता है और क्या यह आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला है? अगर उच्च न्यायालय इस तरह के मामलों में कार्यवाही नहीं करेंगे तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पूरी तरह नष्ट हो जाएगी। हम इसे लेकर बहुत ज्यादा चिंतित हैं। अगर हम इस तरह के मामलों में कार्रवाई नहीं करेंगे तो यह बहुत ही परेशानी वाली बात होगी।”

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